|| ॐ करणी ||
गौ पर दृष्टि – सुखमय सृष्टि
दृष्टि देवी फाउंडेशन निष्काम भाव से विद्यार्थियों को निःशुल्क गौ महिमा सत्संग, गौकृपा कथा सीखाने और उनको सीखने में पूरा सहयोग करना का कार्य कर रहा है, गौ महिमा सत्संग, गौकृपा कथा सीखने हेतु फ़ार्म भरें।
कृपया सभी जानकारी सही-सही भरें
गौ महिमा सत्संग, गौकृपा कथा सीखने हेतु निम्नलिखित 43 नियमों का पालन करना अनिवार्य है
नियम संख्या १
वक्ता मंच से अनावश्यक चर्चा ना करें तथा कथा के उपरांत भी अनावश्यक चर्चा से बचें।
नियम संख्या २
वक्ता कथा समय पर नियमपूर्वक प्रातः 4:00 बजे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाए।
नियम संख्या ३
वक्ता किसी भी सामाजिक या निजी आयोजन विवाह, जन्मदिवस इत्यादि में गौवर्ती प्रसादी बनने और वहाँ गौ-पूजन होने की शर्त पर ही जाए।
नियम संख्या ४
वक्ता व्यासपीठ पर नहीं बिराजे। व्यासपीठ शब्द का प्रयोग भी नहीं करें। गौमयपीठ शब्द का प्रयोग करें।
नियम संख्या ५
वक्ता ना तो उदास रहे, ना ही क्रोधित मुद्रा में रहे। चिड़चिड़ापन ना रखें, अधिक हंसे नहीं, सदैव मुस्कुराते हुए ही बात करें। (वक्ता के लिए ठहाके मार कर हंसना अर्थात् हा हा ही ही करना उचित नहीं है।)
नियम संख्या ६
वक्ता किसी भी व्यक्ति से (आयोजकों या गौभक्तों से) बैर और मित्रता नहीं रखें। (हमारा कोई भी कार्यकर्ता हमसे दूर नहीं है और हमारा कोई भी कार्यकर्ता हमारे करीब नहीं है। इसलिए बैर भाव और मैत्री भाव नहीं रखना चाहिए। यानी पारिवारिक या भावनात्मक संबंध नहीं बनाने चाहिए।)
नियम संख्या ७
वक्ता ध्यान रखें, कि जिस घर में निराश्रित गौमाता एवं नंदी बाबा को बांधा गया हो, गौ सेवा हो रही हो, उन्हीं के घर में पधरावणी करें। (जिस घर में गौ माता विराजित करने की व्यवस्था नहीं हैं, तो वहाँ गौशाला में एक नव निराश्रित गौवंश अपने खर्च पर रख कर गौ-सेवा करें।) गौशाला या घर पर उसके द्वारा एक निराश्रित गौमाता की सेवा आवश्यक रूप से हो रही हो, उसी के घर में पधरावणी करें, अन्यथा नहीं करें।
नियम संख्या ८
अपनी आवाज को धीमी रखकर के बात करें। आवश्यकता पड़ने पर किसी को डांटना है, तो अभिनयपूर्वक डांटे, वो भी बहुत धीमी आवाज में।
नियम संख्या ९
वक्ता धन (रुपया ,चेक आदि ) को सीधा स्पर्श नहीं करें और ना ही वक्ता किसी प्रकार की रसीद काटे, इस कार्य के लिए किसी व्यक्ति को साथ में रखें। किसी के भी हाथ से सीधा धन नहीं ले।
नियम संख्या १०
जिस ग्राम/नगर में कथा हो रही हो, वहाँ के तीर्थ व मंदिर पर अवश्य ही दर्शन हेतु जाए।
नियम संख्या ११
वक्ता प्रतिदिन कम से कम एक घंटा स्वाध्याय और सद्ग्रंथ अध्ययन करें। धार्मिक साहित्य के साथ समाचार पत्र का अध्ययन सामयिकी के दृष्टिकोण से नित्य करें।
नियम संख्या १२
वक्ता कथा से पूर्व निकाली जाने वाली कलश यात्रा गौशाला से ही निकाले। यदि गौशाला दूरी पर है, तो एक वाहन रैली गौशाला से प्रारंभ करें और कलश यात्रा कथा स्थल के समीप किसी मंदिर, सरोवर, सरिता से प्रारंभ कर दें। नोट:-किसी गांव में सार्वजनिक गौशाला नहीं है, तो ऐसी स्थिति में किसी निजी गौष्ठ से जहाँ गौमाता बिराजित हो, वहाँ से कलश यात्रा को प्रारंभ कर सकते है जिस व्यक्ति के पास में 10 से 20 गौमाता हो, उस व्यक्ति के घर को पनघट से भी अधिक महत्व देना चाहिए और जिस गांव में 10 से 20 या उससे अधिक गौमाता किसी के घर पर नहीं है, तो कहीं पनघट पर गौमाता ले जाकर, गौमाता का पूजन कर, फिर वहाँ से कलश यात्रा प्रारंभ करनी चाहिए।
नियम संख्या १३
वक्ता कथा के दौरान सप्त दिवस अथवा 9 दिवस, जब तक कथा चले, जूते/चप्पल/पाहुंनिया इत्यादि धारण नहीं करें।
नियम संख्या १४
कथा के दौरान वक्ता दो समय ही मुंह झूठा करें। एक समय सुबह अन्न ले, शाम के समय फल एवं दूध लेवे। गौभक्तों के अति आग्रह पर भी केवल जल ही स्वीकार करें। भोजन, फलाहार, किसी सात्विक गौभक्त के हाथ से बना हुआ, गौभक्त परिवार में बना हुआ ही पाए। भक्ति भाव रहित श्रीमंत परिवार का भोजन ग्रहण नहीं करें।
नियम संख्या १५
किसी कथा में जो वक्ता के द्वारा संगीतकार वेतन, यात्रा व्यय और यूट्यूब चैनल प्रसारण में खर्च किए जाने वाले धन की व्यवस्था न हो, धन संग्रह नहीं हुआ हो और आयोजक देने में असमर्थ हो, तो लेने की जिद ना करें। नाराज भी ना हो और उनके सामने उदास भी ना हो और वहाँ से दु:खी होकर के भी नहीं निकले। (उन्हें प्रेम से संतुष्ट करें कि कोई बात नहीं, किसी अन्य गौभक्त को कहकर इसकी पूर्ति कर देंगे।)
नियम संख्या १६
कथा पंडाल में गाय माता का बिराजना अत्यंत आवश्यक है। गौ पूजन के बिना कथा प्रारंभ नहीं करनी है।
नियम संख्या १७
नित्य कथा के पश्चात गौवर्ती प्रसादी ही वितरण करवाये।
नियम संख्या १७(१)
पंडाल में प्रवेश करने वाले प्रत्येक श्रोता को पंचगव्य प्राशन करना आवश्यक है।
नियम संख्या १७(२)
कथा स्थल पर प्रवेश करने वाले प्रत्येक श्रोता कर्मचारी अतिथि के गौबर, दही, गौमूत्र, मुस्ता, चंदन, गौरोचन के मिश्रण का तिलक अवश्य लगाना चाहिए। (तिलक लगाने एवं पंचगव्य प्राशन करने के बाद ही मंडप में प्रवेश देना चाहिए।)
नियम संख्या १८
वक्ता ध्यान रखें, कि मंच पर भारतीय पोशाक अर्थात् धोती कुर्ता पहने सज्जन, और सनातनी वस्त्र पहनने वाली महिला ही आए।
नियम संख्या १९
कथा पंडाल और आसपास के स्थान पर सभी प्रकार के व्यसन का प्रयोग प्रतिबंधित होना चाहिए। (चाय कॉफ़ी पर भी प्रतिबंध हो)
नियम संख्या २०
वक्ता कथा में आए हुए सभी संतों का यथोचित सम्मान करें और करवाए। जो संत आशीर्वचन उद्बोधन की रुचि रखते हों, उन्हें अपनी बात रखने का समय प्रदान करें।
नियम संख्या २१
वक्ता कथास्थल पर समय पर, जो समय पत्रक/पोस्टर/ बैनर/ निमंत्रण पत्र में लिखा हो उससे 7 मिनट पहले ही पहुंच जाए। (कभी भी कथा के पत्रक में 1 घंटे पहले का समय नहीं देवें कि श्रोता देरी से आते है, इसलिए समय पहले का लिख दे, समय की मर्यादा का ध्यान रखें।)
नियम संख्या २२
वक्ता आरती के समय गौमयपीठ को प्रणाम कर के उठ जाए और यजमान अतिथि के साथ स्वयं भी आरती करें। (वक्ता अपने स्वयं की आरती, पूजन इत्यादि नहीं करवाये।)
नियम संख्या २३
कथा प्रारंभ होने से पहले गौमाता एवं स्थापित देवी देवताओं का पूजन गौव्रती पंडित जी से करवाये। पंडित जी गौव्रती नहीं होने पर स्वयं करें या यजमान से करवाए।
नियम संख्या २४
कथा पंडाल में किसी भी प्रकार के जलपान, दूध, फल, रस इत्यादि का वितरण कथा के समय नहीं होना चाहिए। गौव्रती दूध, खीर, रबड़ी, आइसक्रीम, लस्सी इत्यादि खाद्य पदार्थों का वितरण कर सकते हैं, परंतु कथा की आरती के पश्चात करें।
नियम संख्या २५
पुरुष कथा वक्ता अपना निवास परिवार रहित खाली घर, विद्यालय, धर्मशाला, मंदिर या अन्य सार्वजनिक स्थान पर ही रखें। (कितना भी बड़ा भक्त हो, उनके परिवार में नहीं रुके।) कथा वक्ता यदि बेटियां हैं, तो किसी धार्मिक सद्गृहस्थ परिवार में, जहाँ माता-बहनें रहती हो, वही निवास करें, एकांत सार्वजनिक स्थान पर नहीं रुके। अपने साथ किसी महिला को रखें। (जहाँ रुके वहाँ घर वालों से किसी भी प्रकार का पारिवारिक सम्बन्ध ना बनाए। उनकी पारिवारिक चर्चाओं में सम्मिलित ना हो, उनके बच्चों को उठाकर नहीं घूमे।)
नियम संख्या २६
वक्ता अपने शयन का समय सुनिश्चित रखें। (लोगौ से अत्यधिक वार्ता में समय व्यर्थ न गंवाये)
नियम संख्या २७
वक्ता आचार्य द्वारा सिखाई गई कथा को, कथा के नोट्स को आचार्य की अनुमति के बिना किसी अन्य जिज्ञासु को प्रदान न करें।
नियम संख्या २८
वक्ता प्रतिदिन कथा के दौरान, वहाँ की स्थानीय गौशाला में जाये। स्वयं अपने हाथ से गौ सेवा करें, गौबर उठाए। (कारणवश प्रथम दिन छुट सकता है, परंतु शेष दिन इसका पालन अवश्य करें।)
नियम संख्या २९
वक्ता यदि बेटियां हैं तो ध्यान रखें कि आवास पर अपने कक्ष में पुरुषों का प्रवेश नहीं होने दे, (कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए कक्ष से बाहर कोई खुले बड़े स्थान पर व्यवस्था रखें)
नियम संख्या ३०
बहनें शुचिता का पूर्ण ध्यान रखें। अशुचिता के समय एकांतिक भजन करें।
नियम संख्या ३०(अ)
वक्ता यदि बेटियां हैं, तो कथा में आते-जाते समय अथवा आसपास कहीं पर भी प्रवास करें, तब अपने साथ में किसी माता बहन को अवश्य लेकर के जाए। वक्ता यदि पुरुष है, तो अपने साथ पुरुषों को लेकर के जाए, अपने वाहन में किसी भी माता बहन को बिठाने से बचे।
नियम संख्या ३१
वक्ता कथा के चार घंटे पूर्व ही मौन धारण कर ले एवं कथा प्रारंभ होने के 5 मिनट पहले अपने मौन को खोल दे। तथा कथा पूर्ण होने के 1 घंटे बाद पुनः दो घंटे का मौन धारण करें। अतः कुल ६ घंटा कथा वक्ता मौन रहे।
नियम संख्या ३२
(1) वक्ता यदि संन्यासी है, तो पुरुष सामान्य बिने सिले भगवे वस्त्र धारण करें। महिला संन्यासी ढीले, बिना किसी प्रिंट के सिले हुए वस्त्र धारण करें। (2) पुरुष वक्ता ग्रहस्थ है, चाहे ब्रह्मचारी कथा के दौरान बिना सिले सफेद वस्त्र धारण करें। चमकीले एवं प्रिंट वाले वस्त्र धारण नहीं करें। रंग-बिरंगी चुनरी, दुपट्टे इत्यादि नहीं धारण करें। बेटियां कथावक्ता सफेद धोती कुर्ता, सफेद साड़ी वस्त्र या ढीला सफेद सलवार कुर्ता धारण करें।
नियम संख्या ३३
वक्ता यदि पुरुष है, तो क्षौर कर्म कराए या पूर्ण बाल दाढ़ी इत्यादि रखें। वक्ता यदि बेटियां है, तो (वेणु) चोटी को बांधकर रखें।
नियम संख्या ३४
वक्ता मुख पर किसी भी प्रकार की प्रसाधन सामग्री का प्रयोग नहीं करें। मुख पर तिलक के अलावा कोई भी सामग्री नहीं लगाए।
नियम संख्या ३५
वक्ता यथासंभव कथा के दौरान सात्विक और पूर्ण गौव्रती आहार लेवें। सब्जी में लौकी, तुरोई, गिलकी, परमल, मूंग, मैथी, पालक, मखाना इत्यादि ही लेवें। प्रयास करें, कि कथा के दौरान अन्न गौ कृषि का ही लें। अन्न में भी यथासंभव प्रयास करें, कि रोटी मक्का, बाजरा, ज्वार, दादर को मिक्स कर बनाई हो, वहीं पाए। अथवा जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार की लेवें। गेहूं से यथासंभव बचना चाहिए। मिठाई में खीर, हलवा, लापसी ले सकते हैं। गरिष्ठ मिठाई का सेवन नहीं करें। गर्मियों में खाने के लिए सरसों का तेल व सर्दियों में तिल का तेल काम में लेवें। हाथ के बिलोने का गौ घृत वक्ता अपने साथ रखें
नियम संख्या ३७
वक्ता ग्रहस्थ है, तो अपनी कथा द्वारा अर्जित आय का कम से कम 80% से अधिक गौ सेवार्थ खर्च करें। 20% से अधिक अपने निजी जीवन पर खर्च ना करें। वक्ता संन्यासी है, तो कुल आय का 1% से भी कम हिस्सा अपने प्राप्त शरीर निर्वाह पर खर्च कर सकते हैं।
नियम संख्या ३८
वक्ता दूसरे कथा वक्ताओं से द्वेष नहीं रखें। गौपाल परिवार के अथवा अन्य किसी कथा वक्ता से अगर कोई शिकायत है, तो तत्कालीन आचार्य के पास बात पहुंचाए, बाहर चर्चा नहीं करें। कथा प्रस्तुतीकरण और गौ ग्रास गौ-सेवा निधि संग्रह में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो, परंतु किसी को भी नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करें।
नियम संख्या ३९
वक्ता अपने चरित्र को सर्वोच्च शिखर पर रखें। (हमारे पूर्ववर्ती आचार्य एवं ऋषियों द्वारा निषिद्ध बताए सभी कार्यों का त्याग और विहित बताए गए सारे कार्य को क्रिया में लाना ही चरित्र है।)
नियम संख्या ४०
वक्ता सक्रिय राजनीति में भाग ना ले। ना ही राजनेताओं से निजी संबंध रखें। मंच से किसी राजनीतिक दल का विरोध या समर्थन नहीं करें।
नियम संख्या ४१
वक्ता अपनी जाति का गुणगान नहीं करें। जातिवाचक वक्तव्य से बचे।
नियम संख्या ४२
कथा यदि गांव की गौशाला के सहयोगार्थ की गयी है, तो अपने संगीतकार वेतन, यात्रा व्यय और यूट्यूब चैनल प्रसारण में खर्च किए जाने वाले धन को निकालने के बाद शेष राशि को कार्यकर्ता के अनुरूप उनके गौ सेवा में लगाए। कथा की शेष राशि से संबंधित चर्चा, पूछताछ और अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करें।
नियम संख्या ४३
दान पात्र और झोली के पैसे कार्यकर्ताओं को दिए जाए वक्ता स्वंय नहीं लेवें। आरती की थाली नहीं घुमाए।
उपरोक्त सभी 43 नियमों का पालन करना अनिवार्य है। किसी भी नियम का उल्लंघन करने पर आवेदन रद्द किया जा सकता है और भविष्य में कथा सीखने की अनुमति नहीं दी जाएगी।